कहीं चंचलता तो कहीं शिथिलता है,
आखिर क्यों तू हाथ धरे बैठा,
क्या तेरे मन की विवशता है ?
आज डूबा है सूरज तो कल फिर से उगेगा,
तेरे भाग्य का चक्र जल्दी ही फिर से चलेगा,
दुःख है पहाड़ सा तो सुख भी मोम की तरह पिघलता है,
आखिर क्या तेरे मन की विवशता है ?
मेरे दुःख का कारण साक्षात्कार की असफलता है ,
क्या मेरे कर्मों की यही परिणीता है ?
हे मानव ! क्या होगा अब पश्चाताप से,
जब अकबर भी हारा राणा प्रताप से,
अब एक ही उपाय है तेरे दुःख का,
कर ले तू साक्षात्कार अपने आप से,
कर ले तू साक्षात्कार अपने आप से |
awesome man...:):)
ReplyDeletevery nice bro....
ReplyDeletegood one.. keep writing... :)
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